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रुपयों की कीमत: रोहन और 10 रुपये का सिक्का - हिंदी कहानी

क्या पैसे पेड़ पर उगते हैं? आलसी रोहन को रुपयों की कीमत कैसे समझ आई? पढ़िए पिता और पुत्र की यह प्रेरणादायक कहानी जो मेहनत का महत्व सिखाती है। 

By Lotpot
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रुपयों की कीमत: रामपुर नाम के एक समृद्ध शहर में 'सेठ धर्मचंद' रहते थे। वे शहर के सबसे अमीर व्यापारी थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत कड़ा संघर्ष किया था और शून्य से शिखर तक का सफर तय किया था। लेकिन उनका बेटा, 'रोहन', बिल्कुल विपरीत था। रोहन 14 साल का था और उसे लगता था कि पैसे पेड़ पर उगते हैं। वह बिना सोचे-समझे महंगे खिलौने, कपड़े और गैजेट्स पर पैसे उड़ाता रहता था।

धन (Money) का असली महत्व वही समझता है जिसने उसे कमाने में पसीना बहाया हो। सेठ धर्मचंद को चिंता थी कि अगर रोहन को रुपयों की कीमत समय रहते नहीं समझाई गई, तो वह भविष्य में अपनी सारी संपत्ति बर्बाद कर देगा। रोहन बहुत आलसी था और उसने आज तक एक तिनका भी उठाकर इधर से उधर नहीं रखा था।

पिता की कठिन परीक्षा

एक दिन सेठ जी ने रोहन को अपने पास बुलाया। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा, "रोहन, तुम रोज नए पैसे मांगते हो। आज मैं तुम्हें एक चुनौती देता हूँ। अगर तुम आज शाम तक अपनी मेहनत से '10 रुपये' कमाकर लाओगे, तभी तुम्हें रात का खाना मिलेगा। वरना आज तुम भूखे सोओगे।"

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रोहन को लगा कि पिताजी मजाक कर रहे हैं या यह कोई बच्चों का खेल है। वह हँसते हुए कमरे से बाहर चला गया। वह सीधा अपनी माँ के पास गया और रोने का नाटक करने लगा। माँ का दिल पसीज गया और उन्होंने चुपके से उसे 10 रुपये का एक सिक्का दे दिया।

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शाम को रोहन पिताजी के पास गया और वह सिक्का उन्हें थमा दिया। सेठ जी ने पूछा, "क्या यह तुमने अपनी मेहनत से कमाया है?" रोहन ने झूठ बोला, "जी पिताजी!" सेठ जी ने वह सिक्का लिया और खिड़की से बाहर कुएं में फेंक दिया। रोहन चुपचाप खड़ा रहा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वह उसकी मेहनत की कमाई नहीं थी। सेठ जी समझ गए कि यह पैसा उसने नहीं कमाया है।

बहन की मदद और वही परिणाम

अगले दिन सेठ जी ने फिर वही शर्त रखी। "आज फिर 10 रुपये कमाकर लाओ, तभी खाना मिलेगा।" इस बार रोहन अपनी बड़ी बहन के पास गया। बहन ने भी लाड़-प्यार में उसे 10 रुपये दे दिए। शाम को रोहन ने वह नोट पिताजी को दिया। सेठ जी ने फिर वही किया - उस नोट को फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। रोहन फिर भी चुप रहा। उसे नोट फटने का कोई दुख नहीं हुआ। सेठ जी ने कहा, "यह भी तुम्हारी कमाई नहीं थी। जाओ, आज भी खाना नहीं मिलेगा।"

अब रोहन परेशान हो गया। माँ और बहन को पिताजी ने सख्त मना कर दिया था कि कोई उसकी मदद नहीं करेगा। अब उसके पास कोई चारा नहीं था। उसे भूख भी जोरों की लगी थी।

मेहनत की पहली सीढ़ी

तीसरे दिन, रोहन घर से निकला। उसने सोचा कि 10 रुपये कमाना कौन सी बड़ी बात है। वह बाजार गया और एक दुकानदार के पास जाकर काम मांगने लगा। दुकानदार ने कहा, "अगर तुम मेरे गोदाम से सामान की ये भारी बोरियां उस ट्रक तक पहुँचा दोगे, तो मैं तुम्हें 10 रुपये दूँगा।"

रोहन ने कभी भारी वजन नहीं उठाया था। लेकिन भूख और पिता की चुनौती ने उसे मजबूर कर दिया। उसने एक बोरी उठाई, तो उसके कंधे दुखने लगे। पसीना उसकी आँखों में जाने लगा। उसके कपड़े गंदे हो गए। कड़ी धूप में मेहनत करते हुए उसे नानी याद आ गई। दो घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद, उसने सारा सामान लोड किया। दुकानदार ने खुश होकर उसे 10 रुपये का एक सिक्का दिया।

रोहन ने वह सिक्का अपनी मुट्ठी में ऐसे भींचा जैसे वह दुनिया का सबसे कीमती हीरा हो। उसके हाथ कांप रहे थे और शरीर टूट रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।

असली कीमत का अहसास

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शाम को रोहन घर पहुँचा। वह बुरी तरह थका हुआ था। उसने अपने पिता के हाथ में वह 10 रुपये का सिक्का रखा। सेठ धर्मचंद ने हमेशा की तरह हाथ उठाया और उस सिक्के को कुएं में फेंकने के लिए आगे बढ़े।

तभी रोहन चीख पड़ा! उसने झपट्टा मारकर अपने पिता का हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों में आँसू थे। वह चिल्लाया, "नहीं पिताजी! आप इसे नहीं फेंक सकते! इसे कमाने में मेरे कंधे टूट गए हैं, मेरे हाथों में छाले पड़ गए हैं और मैंने धूप में पसीना बहाया है। यह मेरी मेहनत की कमाई है!"

सेठ धर्मचंद मुस्कुराए। उन्होंने रोहन को गले लगा लिया। उन्होंने कहा, "बेटा, आज तुम्हें हिंदी नैतिक कहानियां पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, तुमने खुद जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख लिया है। जब मैंने पिछले दो बार पैसे फेंके, तो तुम्हें दर्द नहीं हुआ क्योंकि वह मुफ्त का पैसा था। लेकिन आज तुम्हें दर्द हुआ क्योंकि इसमें तुम्हारी मेहनत छिपी है। यही रुपयों की कीमत है।"

रोहन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने कसम खाई कि वह भविष्य में कभी भी पैसों की फिजूलखर्ची नहीं करेगा और मेहनत का सम्मान करेगा।

उस दिन के बाद रोहन बदल गया। वह अपनी पढ़ाई और काम में ध्यान देने लगा। उसे समझ आ गया था कि पैसा अमीर बाप की जेब से नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत के पसीने से आता है।

बच्चों, यह प्रेरणादायक कहानी हमें याद दिलाती है कि हमें अपने माता-पिता के पैसों का सम्मान करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि उसे कमाने में कितनी मेहनत लगती है।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story):

  1. मेहनत का सम्मान: अपनी मेहनत से कमाए गए धन का मोल मुफ्त के धन से कहीं ज्यादा होता है।

  2. पैसों की कद्र: पैसे को पानी की तरह नहीं बहाना चाहिए, उसका सही उपयोग करना चाहिए।

  3. आत्मनिर्भरता: दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद मेहनत करना सीखना चाहिए। 

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